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Thursday, December 23, 2010

प्रबल इच्छा

प्रबल इच्छा क्या है ? प्रबल इच्छा का तात्पर्य उस दृढ़ निश्चय से है जो हमें किसी लक्ष्यप्राप्ति के लिए करता होता है। यह लक्ष्य शक्ति, ओहदा, धन या ऐसी ही अन्य कोई वस्तु हो सकती है। कुछ बड़ा पाने या करने के लिये महत्त्वाकांक्षा अनिवार्य है। जीवन में कुछ बड़ा करने का दृढ़ निश्चय। एक स्कूली छात्र ने साॅफ्टवेयर की कम्पनी शुरू की – माइक्रो साॅफ्ट। इसी बीच इस छात्र ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। जब वह अपने स्नातक पाठ्यक्रम के द्वितीय वर्ष में था, कम्पनी ने बहुत बड़ा लाभ कमाना शुरू किया । उसकी प्रबल इच्छा थी कि वह अरबपति बने। उसने अपनी पढ़ाई छोड़ दी क्योंकि कम्पनी का काम बढ़ गया था। उसने अपने लक्ष्य को पहचाना और अपने जीवन के महत्त्वाकांक्षी कार्य को बीस वर्ष में पूरा कर लिया। उसकी प्रतिदिन आय वर्ष 1998 में आठ सौ करोड़ थी। आज वह इस धरती का सबसे धनी व्यक्ति है। कौन है वह महान् व्यक्ति ? —- वह बिलगेट्स है।
क्या प्रबल इच्छा, उत्साह एवं साहस के अभाव में तेनसिंह और हिलेरी एवरेस्ट पर्वत की चोटी पर चढ़ने में सफल हो पाते?

"जीओ और जीने दो..."ब्रह्माकुमार भगवान भाई ने मानव अधिकार दिवस निमित्त

"जीओ और जीने दो..."

डूंगरपुर । मानवाधिकार दिवस मनाने के पीछे प्रमुख ध्येय यह है कि हमें किस तरह से जीवन यापन करना चाहिए और कैसा हमारा व्यवहार होना चाहिए। मनुष्य को जीओ और जीने दो की तर्ज पर जीवन व्यतीत करना ही मानवाधिकार दिवस सीखाता है।
ये प्रवचन जिला कारागृह में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से आए ब्रह्माकुमार भगवान भाई ने मानव अधिकार दिवस निमित्त आयोजित कार्यक्रम में दिए। उन्होंने कहा कि हमारे लिए स्थूल और सूक्ष्म दो प्रकार के नियम है। जब उनका उल्लंघन करते हैं, तब व्यवस्थाओं में गड़बड़ी हो जाती है। परमात्मा ने सबके लिए कानून एवं नियम बनाए हैं। कुछ वर्षो पूर्व तक मनुष्य अपने अधिकारों और मर्यादाओं को भली-भांति जान उनका पालन करता था।

कलियुग के प्रभाव के चलते वह सब कुछ भूलता जा रहा है। मनुष्य को अपने अधिकार और मर्यादाओं का ज्ञान सत्संग से ही आ सकता है। उन्होंने जीवन में संयम को अपनाने की प्रतिज्ञा भी दिलवाई। इस दौरान अधीक्षक घीसाराम चौधरी, रूपलाल भाई, राजयोग केन्द्र की बी.के. विजय बहन शामिल हुए।

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के ब्रह्माकुमार भगवानभाई

'नैतिक मूल्यों से विकास''नैतिक मूल्यों से विकास'
Saturday, 11 Dec 2010 1:28:11 hrs IST

डूंगरपुर । आदर्श समाज में नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक मूल्य प्रचलित हैं। इससे बेहतर जीवन जीने के लिए मार्गदर्शन मिलता है। नैतिक मूल्यों की धारणा से ही मानव मन की आंतरिक शक्तियों का विकास होता है।ये प्रवचन प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के ब्रह्माकुमार भगवानभाई ने शुक्रवार को राजकीय बालिका माध्यमिक विद्यालय टाउन में दिए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति अगर चरित्र का उत्थान करना चाहता है, तो उसे आंतरिक शक्तियों द्वारा आत्मबल बढाना होगा। आत्मबल में बढोत्तरी नैतिकता के बिना नहीं आ सकती है। उन्होंने कहा कि सहनशीलता, नम्रता, धैर्यता, शीतलता, शांति, भाईचारा, स्नेह आदि सद्गुणों से व्यक्तित्व का विकास होता है। सद्गुणों से ही चरित्र उत्थान होता है।

उन्होंने अशांति, चोरी करना, लडाई-झगडा, व्यसन, नशा आदि अवगुणों से दूर रहना चाहिए। इस मौके पर बी.के. हेमा बहन, अतिरिक्त जिला शिक्षा अघिकारी योगेशचन्द्र रोत, प्रधानाचार्य गिरिजा वैष्णव ने भी विचार व्यक्त किए

योगीराज बह्माकुमार भगवानभाई ने आध्यात्मिक

ब्रह्माकुमारी संस्थान में सोमवार को माउंट आबू से पधारे योगीराज बह्माकुमार भगवानभाई   ने आध्यात्मिक शिविर को संबोधित करते हुए कहा कि संसार के सभी क्षेत्रों मसलन शिक्षा, व्यापार, राजनीति, धर्म और विज्ञान को अध्यात्म के रंग में रंगना होगा। तभी समाज एक सही दिशा में गतिशील होगा। अध्यात्म समाज में नैतिक उत्तरदायित्व निभाने के लिए प्रेरित ही नहीं करता, सदाचारी जीवन जीने के लिए उकसाता है।
उन्होंने ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय को एक आध्यात्मिक ऊर्जा घर बताते हुए कहा कि ईश्वरीय राजयोग से अष्ट शक्तियों की प्राप्ति होती है। जीवन में निर्विघ्न सफलता के लिए राजयोग को देखने और समझने की जरूरत है। समय की महत्ता बताते हुए कहा, कलयुग का अंत और सतयुग आदि के बीच इस संगम युग में आध्यात्मिक ज्ञान की दिव्य शक्ति से विश्व परिवर्तन का पुनीत कार्य हो रहा है। समय के महत्व को समझें।
माउंट आबू से  ब्रह्माकुमार भगवानभाई ने कहा कि यदि भगवान को पाकर भी छोटी-छोटी, अल्पकालीन कामनाओं का गुलाम रहें तो भला आदमी कैसे आनंदित होगा? इसलिए हमें इच्छाओं की अधीनता छोड़कर अधिकारीपन की स्थिति पैदा करनी चाहिए। इच्छाओं को हमें अपने अधीन होना चाहिए।
संचालिका बहन निर्मला ने कहा कि शरीर निर्वाह में तो मुनष्य पूरा ही दिन-रात लगा देता है, परंतु अपने समय का थोड़ा भी हिस्सा यदि मनुष्य आत्म निर्वाह में लगाए तो उसे मनुष्य जीवन का सच्चा सुख प्राप्त हो सकता है। मौके पर दर्जनों धर्मप्रेमी उपस्थित थे।