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Tuesday, November 8, 2011

राजयोग का आधार और विधी योग का अति सरल अर्थ है - किसी की याद. किसी भी याद आना या किसी को याद करना - यह मनुष्य का स्वाभाविक गुण है. मन जिस विषय पर सोचता है, उसी के साथ उस आत्मा का योग है. फिर वह चाहे व्यक्ति, वस्तु, वौभव या परिस्थिति हो या परमात्मा ही क्यों न हो. अब मन कहाँ-कहाँ जा सकता है, मन का कहीं भी जाने का आधार क्या हैं ? संसार में करोड़ो मनुष्य है लेकिन मन सभी के विषय में नहीं सोचता है. मन उसी के बारें में सोचेगा, जिसका उसे परिचय हो तो पहला आधार है परिचय. फिर जिसके साथ सम्बन्ध तीसरा आधार है स्नेह. जिससे स्नेह होता है उसके पास मन अपने आप चला जाता है. चौथा आधार है प्राप्ति. जहाँ से किसी को प्राप्ति होगी वहाँ से वह अपना मन हटाना ही नही चाहेंगा. तो किसी की भी याद के लिए मुख्य चार आधार है - परिचय, सम्बधन्ध, स्नेह और प्रापित. इनहीं चा आधारों के कारण मनुष्य की याद सदा बदलती ही रहती है या परिवर्तनशील होती है. एक बालक का योग अपनी माता के साथ है क्योंकि उसको केवल माँ का परिचय है. माँ से ही उसे स्नेह मिलता है, भोजन मिलता है. माँ को न देखने पर वह रोता है और माँ के उसे उठाने पर वह चुप हो जाता है. इससे सिध्द है कि उसका योग अपनी माता के साथ है. बालक थोड़ा बड़ा होने पर खेलकूद में रस लेने लगता है तब उसका योग माँ से परिवर्तित होकर अपने दोस्तों और खेल में जुट जाता है और माँ का बुलावा भी वह टालने की कोशिश करता है. विद्यार्थी जीवन में बच्चे का योग अपनी पढ़ाई, पाठशाला और शिखक से हो जाता है. व्यावहारिक जीवन में आने के बाद उसका योग - धन, सम्पत्ति, मर्तबा, इज्जत, अन्य सम्पर्क मंे आने वाले व्यक्तियों के साथ हो जाता है, विवाह होने पर कुछ समय के लिए उसका योग पत्नी के साथ हो जाता है. सन्तान होने पर पत्नी से भी योग हटकर सन्तान से हो जाता है. बीमारी के दिनों में पूरा ही योग डॉक्टर के साथ होता है. क्योंकि उससे ही इलाज होना है. इस प्रकार योग परिवर्तनशील है तो फिर देहधारियोंे से योग हटाकर परमात्मा से योग लगाना कठिन क्यों होना चाहिए, जहाँ परिचय, सम्बध, स्नेह और प्राप्ति है वहाँ योग लगाना बड़ा ही सहज है, अब ये चारों ही आधार परमात्मा से जोड़े जाएँ तो राजयोग कोई कठिन विधि नहीं है. सबसे पहले राजयोग के लिए स्वयं का और परमात्मा का परिचय होना आवश्यक है. मौ कोन हॅूं और मुझे किसके साथ योग लगाना है ? अगर हम अपने-आपको देह समझेंगे तो हम परमात्मा के साथ कभी भी योगयुक्त नहीं हो सकेंगे. देह अभिमान समझने से यही संकल्प आयेगे - `मौ पिता हँू` तो बच्चे याद आयेंगे, ``मौ शिक्षक हँू`` तो विद्यार्थी याद आयेगें ``मौ व्यापारी हँू`` तो ग्राहक याद आयेंगे. लेकिन जब स्वयं को आत्मा निश्चय करेंगे तब ही परमात्मा याद आयेगा. इस प्रकार राजयोग की पहली सीढ़ी है - आत्मा और परमात्मा के पूर्ण परिचय के आधार पर दोनों मे निश्चय. दोनों का परिचय तो दूसरे और तीसरे सत्र मं मिला है, अब परमात्मा के साथ आत्मा का किस प्रकार के सम्बन्ध और उसको याद करने की विधी

राजयोग का आधार और विधी

योग का अति सरल अर्थ है - किसी की याद. किसी भी याद आना या किसी को याद करना - यह मनुष्य का स्वाभाविक गुण है. मन जिस विषय पर सोचता है, उसी के साथ उस आत्मा का योग है. फिर वह चाहे व्यक्ति, वस्तु, वौभव या परिस्थिति हो या परमात्मा ही क्यों न हो. अब मन कहाँ-कहाँ जा सकता है, मन का कहीं भी जाने का आधार क्या हैं ? संसार में करोड़ो मनुष्य है लेकिन मन सभी के विषय में नहीं सोचता है. मन उसी के बारें में सोचेगा, जिसका उसे परिचय हो तो पहला आधार है परिचय. फिर जिसके साथ सम्बन्ध तीसरा आधार है स्नेह. जिससे स्नेह होता है उसके पास मन अपने आप चला जाता है. चौथा आधार है प्राप्ति. जहाँ से किसी को प्राप्ति होगी वहाँ से वह अपना मन हटाना ही नही चाहेंगा. तो किसी की भी याद के लिए मुख्य चार आधार है - परिचय, सम्बधन्ध, स्नेह और प्रापित. इनहीं चा आधारों के कारण मनुष्य की याद सदा बदलती ही रहती है या परिवर्तनशील होती है. एक बालक का योग अपनी माता के साथ है क्योंकि उसको केवल माँ का परिचय है. माँ से ही उसे स्नेह मिलता है, भोजन मिलता है. माँ को न देखने पर वह रोता है और माँ के उसे उठाने पर वह चुप हो जाता है. इससे सिध्द है कि उसका योग अपनी माता के साथ है. बालक थोड़ा बड़ा होने पर खेलकूद में रस लेने लगता है तब उसका योग माँ से परिवर्तित होकर अपने दोस्तों और खेल में जुट जाता है और माँ का बुलावा भी वह टालने की कोशिश करता है. विद्यार्थी जीवन में बच्चे का योग अपनी पढ़ाई, पाठशाला और शिखक से हो जाता है. व्यावहारिक जीवन में आने के बाद उसका योग - धन, सम्पत्ति, मर्तबा, इज्जत, अन्य सम्पर्क मंे आने वाले व्यक्तियों के साथ हो जाता है, विवाह होने पर कुछ समय के लिए उसका योग पत्नी के साथ हो जाता है. सन्तान होने पर पत्नी से भी योग हटकर सन्तान से हो जाता है. बीमारी के दिनों में पूरा ही योग डॉक्टर के साथ होता है. क्योंकि उससे ही इलाज होना है. इस प्रकार योग परिवर्तनशील है तो फिर देहधारियोंे से योग हटाकर परमात्मा से योग लगाना कठिन क्यों होना चाहिए, जहाँ परिचय, सम्बध, स्नेह और प्राप्ति है वहाँ योग लगाना बड़ा ही सहज है, अब ये चारों ही आधार परमात्मा से जोड़े जाएँ तो राजयोग कोई कठिन विधि नहीं है.

सबसे पहले राजयोग के लिए स्वयं का और परमात्मा का परिचय होना आवश्यक है. मौ कोन हॅूं और मुझे किसके साथ योग लगाना है ? अगर हम अपने-आपको देह समझेंगे तो हम परमात्मा के साथ कभी भी योगयुक्त नहीं हो सकेंगे. देह अभिमान समझने से यही संकल्प आयेगे - `मौ पिता हँू` तो बच्चे याद आयेंगे, ``मौ शिक्षक हँू`` तो विद्यार्थी याद आयेगें ``मौ व्यापारी हँू`` तो ग्राहक याद आयेंगे. लेकिन जब स्वयं को आत्मा निश्चय करेंगे तब ही परमात्मा याद आयेगा. इस प्रकार राजयोग की पहली सीढ़ी है - आत्मा और परमात्मा के पूर्ण परिचय के आधार पर दोनों मे निश्चय. दोनों का परिचय तो दूसरे और तीसरे सत्र मं मिला है,
अब परमात्मा के साथ आत्मा का किस प्रकार के सम्बन्ध और उसको याद करने की विधी