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Sunday, October 2, 2011

परमात्‍मा एक है, वह निराकार एवं अनादि है। वे विश्‍व की सर्वशक्तिमान सत्‍ता है और ज्ञान के सागर है।”

परमात्‍मा एक है, वह निराकार एवं अनादि है। वे विश्‍व की सर्वशक्तिमान सत्‍ता है और ज्ञान के सागर है।”

इस मूलभूत सिद्धांत का पालन करते हुए प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय इन दिनों विश्‍व भर में धर्म को नए मानदंडों पर परिभाषित कर रहा है। जीवन की दौड़-धूप से थक चुके मनुष्‍य आज शांति की तलाश में इस संस्‍था की ओर प्रवृत्‍त हो रहे हैं।

यह कोई नया धर्म नहीं बल्कि विश्‍व में व्‍याप्‍त धर्मों के सार को आत्‍मसात कर उन्‍हें मानव कल्‍याण की दिशा में उपयोग करने वाली एक संस्‍था है। जिसकी विश्‍व के 72 देशों में 4,500 से अधिक शाखाएँ हैं। इन शाखाओं में 5 लाख विद्यार्थी प्रतिदिन नैतिक और आध्‍यात्मिक शिक्षा ग्रहण करते हैं।

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इस संस्‍था की स्‍थापना दादा लेखराज ने की, जिन्‍हें आज हम प्रजापिता ब्रह्मा के नाम से जानते हैं।

दादा लेखराज अविभाजित भारत में हीरों के व्‍यापारी थे। वे बाल्‍यकाल से ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। 60 वर्ष की आयु में उन्‍हें परमात्‍मा के सत्‍यस्‍वरूप को पहचानने की दिव्‍य अनुभूति हुई। उन्‍हें ईश्‍वर की सर्वोच्‍च सत्‍ता के प्रति खिंचाव महसूस हुआ। इसी काल में उन्‍हें ज्‍योति स्‍वरूप निराकार परमपिता शिव का साक्षात्‍कार हुआ। इसके बाद धीरे-धीरे उनका मन मानव कल्‍याण की ओर प्रवृत्‍त होने लगा।

उन्‍हें सांसारिक बंधनों से मुक्‍त होने और परमात्‍मा का मानवरूपी माध्‍यम बनने का निर्देश प्राप्‍त हुआ। उसी की प्रेरणा के फलस्‍वरूप सन् 1936 में उन्‍होंने इस विराट संगठन की छोटी-सी बुनियाद रखी। सन् 1937 में आध्‍यात्मिक ज्ञान और राजयोग की शिक्षा अनेकों तक पहुँचाने के लिए इसने एक संस्‍था का रूप धारण किया।

इस संस्‍था की स्‍थापना के लिए दादा लेखराज ने अपना विशाल कारोबार कलकत्‍ता में अपने साझेदार को सौंप दिया। फिर वे अपने जन्‍मस्‍थान हैदराबाद सिंध (वर्तमान पाकिस्‍तान) में लौट आए। यहाँ पर उन्‍होंने अपनी सारी चल-अचल संपत्ति इस संस्‍था के नाम कर दी। प्रारंभ में इस संस्‍था में केवल महिलाएँ ही थी।

बाद में दादा लेखराज को ‘प्रजापिता ब्रह्मा’ नाम दिया गया। जो लोग आध्‍या‍त्मिक शांति को पाने के लिए ‘प्रजापिता ब्रह्मा’ द्वारा उच्‍चारित सिद्धांतो पर चले, वे ब्रह्मकुमार और ब्रह्मकुमारी कहलाए तथा इस शैक्षणिक संस्‍था को ‘प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्‍वरीय विश्‍व विद्यालय’ नाम दिया गया।

इस विश्‍वविद्यालय की शिक्षाओं (उपाधियों) को वैश्विक स्‍वीकृति और अंतर्राष्‍ट्रीय मान्‍यता प्राप्‍त हुई है।

बदला लेने की बजाय स्वयं को बदलो: भगवानभाई

बदला लेने की बजाय स्वयं को बदलो: भगवानभाई

बालोतरा & प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की शाखा बालोतरा की ओर से शुक्रवार को बालोतरा उप कारागृह में संस्कार परिवर्तन एवं व्यवहार शुद्धि पर व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। इस अवसर पर माउंट आबू के राजयोगी ब्रह्मकुमार भगवान भाई ने कहा कि कर्मों की गति बड़ी निराली है। कर्मों के आधार पर ही यह संसार चलता है। कर्म से ही मनुष्य महान बनता है। उन्होंने कहा कि मनुष्यों के कर्म से ही वात्या जैसे डाकू से वाल्मिकी जैसे रामायण लिखने वाले महान व्यक्ति समान माने जाते हैं। मनुष्य जीवन बड़ा ही अनमोल है, उसे ऐसे ही व्यर्थ कर्म कर व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। मनुष्यों की गलतियां ही उसे सही रूप में इंसान बना सकती है। केवल हमें उसकी गलतियों को स्वयं ही महसूस कर उसे बदलना है। भगवानभाई ने कहा कि यह कारागृह बंदियों के लिए तपस्थली है। इसमें एकांत में बैठकर स्वयं के बारे में सोचना है कि मै इस संसार में क्यों आया हूं, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है, भगवान ने मुझे किस उद्देश्य से इस संसार में भेजा है और मैं यहां आकर क्या कर रहा हूं। उन्होंने बंदियों को इन बातों पर चिंतन कर बदला लेने की भावना की बजाय स्वयं को बदलने की पे्ररणा दी। स्थानीय ब्रह्माकुमारी राजयोग केंद्र की संचालिका बीके उमाबहन ने कहा कि हमें परमात्मा ने ये इंद्रियां दी है, उसका दुरुपयोग नहीं करना है। हम लोभ, लालच में आकर उसका दुरुपयोग करते हैं तो फिर अगले जन्म में ये इंद्रियां अधूरे रूप में होंगी। जेल अधीक्षक सुरेंद्रसिंह ने कहा कि जब हम अपना मनोबल कमजोर करते हैं तब हम अपने आप को आंतरिक रूप से अकेले महसूस करते हैं। मनोबल कमजोर होने से शांति, एकाग्रता भंग हो जाती है। कार्यक्रम में बीके भलाराम ने ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के बारे में जानकारी दी।

बदला लेने की बजाय स्वयं को बदलो: भगवानभाई

बदला लेने की बजाय स्वयं को बदलो: भगवानभाई

बदला लेने की बजाय स्वयं को बदलो: भगवानभाई

बालोतरा & प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की शाखा बालोतरा की ओर से शुक्रवार को बालोतरा उप कारागृह में संस्कार परिवर्तन एवं व्यवहार शुद्धि पर व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। इस अवसर पर माउंट आबू के राजयोगी ब्रह्मकुमार भगवान भाई ने कहा कि कर्मों की गति बड़ी निराली है। कर्मों के आधार पर ही यह संसार चलता है। कर्म से ही मनुष्य महान बनता है। उन्होंने कहा कि मनुष्यों के कर्म से ही वात्या जैसे डाकू से वाल्मिकी जैसे रामायण लिखने वाले महान व्यक्ति समान माने जाते हैं। मनुष्य जीवन बड़ा ही अनमोल है, उसे ऐसे ही व्यर्थ कर्म कर व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। मनुष्यों की गलतियां ही उसे सही रूप में इंसान बना सकती है। केवल हमें उसकी गलतियों को स्वयं ही महसूस कर उसे बदलना है। भगवानभाई ने कहा कि यह कारागृह बंदियों के लिए तपस्थली है। इसमें एकांत में बैठकर स्वयं के बारे में सोचना है कि मै इस संसार में क्यों आया हूं, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है, भगवान ने मुझे किस उद्देश्य से इस संसार में भेजा है और मैं यहां आकर क्या कर रहा हूं। उन्होंने बंदियों को इन बातों पर चिंतन कर बदला लेने की भावना की बजाय स्वयं को बदलने की पे्ररणा दी। स्थानीय ब्रह्माकुमारी राजयोग केंद्र की संचालिका बीके उमाबहन ने कहा कि हमें परमात्मा ने ये इंद्रियां दी है, उसका दुरुपयोग नहीं करना है। हम लोभ, लालच में आकर उसका दुरुपयोग करते हैं तो फिर अगले जन्म में ये इंद्रियां अधूरे रूप में होंगी। जेल अधीक्षक सुरेंद्रसिंह ने कहा कि जब हम अपना मनोबल कमजोर करते हैं तब हम अपने आप को आंतरिक रूप से अकेले महसूस करते हैं। मनोबल कमजोर होने से शांति, एकाग्रता भंग हो जाती है। कार्यक्रम में बीके भलाराम ने ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के बारे में जानकारी दी।

Saturday, October 1, 2011


 मेरे बाबा प्यारे बाबा मीठे बाबा दयालु बाबा कृपालु बाबा, जो मेरे माता पिता बन्धु सखा स्वामी खुदा दोस्त है ... बापटीचरगुरु , सतबाप सतटीचर सतगुरु सदगुरु , सुप्रीमबाप सुप्रीमटीचर सुप्रीमगुरु , परमबाप परमटीचर परमगुरु , रूहानीबाप रूहानीटीचर रूहानीगुरु , बेहदबाप बेहदटीचर बेहदगुरु , जगतबाप जगतगुरु जगतटीचर , सर्व का बाप सर्व का टीचर सर्व का गुरु , सत्यत्रिमूर्ती शिवबाप सत्यत्रिमूर्ति शिवटीचर सत्यत्रिमूर्ति शिवगुरु .... जो ज्ञान का सागर , पवित्रता का सागर , सुख का सागर , शांति का सागर , प्रेम का सागर , आनन्द का सागर , सर्व शक्तियों का सागर , सर्व गुणों का सागर , सर्व सम्पत्ति का सागर और सर्वज्ञ है....
 मैं आत्मा बाप को फोलो करने वाला , बाप की श्रीमत वाला , ब्रहस्पति की दशा वाला बाप का सहयोगी आज्ञाकारी पुरुशोत्तम बच्चा हूँ .... मनमनाभव में स्थित हूँ ....... श्रेष्ठ कर्म करने वाला बाप का सहयोगी हूँ .... हम भारत को पुरुशोत्तम बनाने वाले और सर्व को पुरुशोत्तम बनने का मंत्र देने वाला सतोप्रधान सतयुगी स्वर्गवासी पुरुशोत्तम है ..... हम सहज याद वाले , योगबल , बाप की याद वाले पवित्र पावन धर्मात्मा महात्मा देवात्मा पुण्यआत्मा कर्मयोगी है ...... याद का चार्ट रखने वाला बाप का निडर बच्चा हूँ .. अंधों की लाठी है ..... हम पूरा पढने वाले उंच पद वाले पावन देवी देवता है .....मैं आत्मा सर्व खजानों से भरपूर बन अपने चहरे से सेवा करने वाला सच्चा सेवाधारी हूँ ...... समय और संकल्प के खजानों को जमा करने वाला बेहद का एक्टर हूँ ....... मैं आत्मा बाप का नाम बाला करने वाला बेहद का एक्टर हूँ .......
 ज्ञान सूची ...... बाप की निंदा करना माना इंच पद माना राजा नहीं बन सकते ..... उंच पद है तो भूल की भी कड़ी सजा है .......

पूरने वा अवगुणो का अग्नि संस्कार .........६३ अवगुण ...... सितंबर ०१ ......... नाम मान शान का भिखारीपन .... मैं आत्मा नाम मान से परे हूँ और बाप का नाम बाला करने वाला हूँ .....

... मैं आत्मा परमधाम शान्तिधाम शिवालय में हूँ ..... शिवबाबा के साथ हूँ ..... समीप हूँ .... समान हूँ ..... सम्मुख हूँ ..... सेफ हूँ ..... बाप की छत्रछाया में हूँ .....अष्ट इष्ट महान सर्व श्रेष्ठ हूँ ...... मैं आत्मा मास्टर ज्ञानसूर्य हूँ .... मास्टर रचयिता हूँ ..... मास्टर महाकाल हूँ ..... मास्टर सर्व शक्तिवान हूँ ..... शिव शक्ति कमबाइनड हूँ ..... अकालतक्खनशीन हूँ ....अकालमूर्त हूँ ..... अचल अडोल अंगद एकरस एकटिक एकाग्र स्थिरियम और बीजरूप हूँ ........ मैं आत्मा जागती ज्योत अथक निन्द्राजित कर्मयोगी धर्मात्मा महात्मा देवात्मा पुण्य आत्मा हूँ ........ शक्तिसेना हूँ ..... शक्तिदल हूँ ...... शक्तिआर्मी सर्वशक्तिमान हूँ ........ रुहे गुलाब .... जलतीज्वाला .... ज्वालामुखी .... ज्वालास्वरूप .... ज्वालाअग्नि हूँ .... मैं आत्मा..... नाम मान शान का भिखारीपन .... .......... के संस्कार का अग्नि संस्कार कर रही हूँ .... जला रही हूँ ...... भस्म कर रही हूँ ...... नाम मान से परे हूँ और बाप का नाम बाला करने वाला हूँ .....
 ....मैं आत्मा महारथी हनुमान महावीर विजयी रूहानी सेनानी हूँ ...... मैं आत्मा अवगुणों का भस्म करने वाली देही अभिमानी, आत्म-अभिमानी, रूहानी अभिमानी, परमात्म अभिमानी, परमात्मा ज्ञानी, परमात्म भाग्यवान ...... सर्वगुण सम्पन्न ....... सोले काला सम्पूर्ण ..... सम्पूर्ण निर्विकारी ..... मर्यादा पुरुशोत्तम ....... डबल अहिंसक हूँ ...... डबल ताजधारी विश्व का मालिक हूँ ....... ताजधारी तख्तधारी तिलकधारी दिलतख़्तनशीन डबललाइट सूर्यवंशी शूरवीर महाबली महाबलवान, बाहु बलि पहेलवान ..... अष्ट शक्तिधारी ..... अष्ट भुजाधारी ..... अस्त्र शस्त्रधारी ..... शक्तिमूर्त ...... संहारनीमूर्त ..... अलंकारीमूर्त ...... कल्याणीमूर्त ...... श्रुन्गारीमूर्त ..... अनुभवीमूर्त और लाइफ में सदा प्रेक्टिकलमूर्त शिवमइ शक्ति हूँ ..........

शोर्ट होमवर्क ......... मैं आत्मासहज याद वाला अन्धो की लाठी , योगबल वाला सहयोगी , याद का चार्ट वाला पावन , बाप की श्रीमत वाला पुण्य आत्मा , भारत को पुरुशोत्तम बनाने वाला और सर्व को पुरुशोत्तम का मन्त्र देने वाला ब्रहस्पति की दशा वाला
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