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Monday, May 23, 2011

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय आबूरोड के शांतिवन के बीके भगवान भाई द्वारा पांच हजार स्कूलों में हजारों बच्चों को मूल्यनिष्ठ शिक्षा के जरिए नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए लगातार


भगवान भाई द्वारा पांच हजार स्कूलों में हजारों बच्चों को मूल्यनिष्ठ शिक्षा

सिरोही। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय आबूरोड के
शांतिवन के बीके भगवान भाई द्वारा पांच हजार स्कूलों में हजारों बच्चों
को मूल्यनिष्ठ शिक्षा के जरिए नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए लगातार
पढ़ाए जाने पर तथा आठ सौ जेलों में हजारों कैदियों को अपराधों को छोड़
अपने जीवन में सदभावना, मूल्य तथा मानवता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से
आयोजित किए गए हजारों कार्यक्रमों के जरिए संदेश देने के अथक प्रयास को
'इंडिया बुक ऑफ रिकार्डÓ में दर्ज किया गया है। दिल्ली के कनाट प्लेस में
22 अप्रैल को यह सर्टिफिकेट इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड के चीफ एडिटर विश्वरूप
राय चौधरी द्वारा एक समारोह में दिया गया। इस अवसर पर विश्वरूप राय चौधरी
ने कहा कि ऐसे प्रयास से लोगों के जीवन में एक नई उर्जा का संचार होगा
तथा लोगों में सद्भावना को बढ़ावा मिलेगा। बीके भगवान भाई पिछले कई सालों
में अथक प्रयास से देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर हजारों स्कूलों में
बच्चों तथा जेलों में कैदियों में मानवता का बीज बोने का अथक प्रयास करते
रहे है, जिससे यह सफलता मिली है।

प्रजापति ब्रह्मïकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के ब्रह्मïकुमार भगवान भाई ने कहा कि जीवन में नैतिक मूल्यों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

नैतिकता के बगैर भविष्य अंधकारमय : भगवान भाई
प्रजापति ब्रह्मïकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के ब्रह्मïकुमार भगवान भाई ने कहा कि जीवन में नैतिक मूल्यों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

वे शुक्रवार को उत्तमीबाई कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में नैतिक शिक्षा जागृत अयिभान के तहत एकत्रित छात्राओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आधुनिक के जमाने में जीवन के उद्देश्य को सार्थक बनाने के लिए मूल्यों को धारण करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भेदभाव, घृणा आदि को खत्म करने के लिए एकता,ईमानदारी व अहिंसा जैसे मूल्यों की आवश्कता है।

तनाव मुक्ति के उपाय----- ब्रह्मकुमार भगवन भाई
तनाव मुक्ति के उपाय----- ब्रह्मकुमार भगवन भाई आबू पर्वत राजस्तान
1. जीवन की हर एक घटना में किसी न किसी रूप से आपको लाभ ही होता
है.परोक्ष रूप से होने वाले लाभ के बारे में ही सदैव सोचिये .
२. भूतकाल में की गई गलतियों का पश्चाताप न करें तथा भविष्य की चिंता न
करें.वर्तमान को सफल बनाने के लिए पूरा ध्यान दीजिये.आज ही दिन आपके हाँथ
में है.आज आप रचनात्मक कार्य करेंगें तो कल की गलतियाँ मिट जाएगी और
भविष्य में अवश्य लाभ होगा.
3. आप अपने जीवन की तुलना अन्य के साथ कर चिंतित न हों.क्योंकि इस विश्व
में आप एक अनोखे और विशिष्ट व्यक्ति हैं.इस विश्व में आपके और जैसा कोई
नहीं है .
4. सदैव याद रखिये कि आपकी निंदा करने वाला आपका मित्र है जो आपसे बिना
मूल्य एक मनोचिकित्सक की भांति आपकी गलतियों व आपकी खामियों की तरफ आपका
ध्यान खिचवाता है.
5 आप दुख पहुँचाने वाले को क्षमा कर दो तथा उसे भूल जाओ.
6. सभी समस्याओं को एक साथ सुलझाने का प्रयत्न करके मुझना नहीं.एक समय पर
एक ही समस्या का समाधान करें
7. जितना हो सके उतना दूसरों के सहयोगी बनने का प्रयत्न करें.दूसरों के
सहायक बनने से आप अपनी चिंताओं को अवश्य भूल जायेंगें.
8. जीवन में आ रही समस्याओं को देखने का दृष्टिकोण बदलें.दृष्टिकोण को
बदलने से आप दुख को सुख में परिवर्तन कर सकेंगें.
9. जिस परिस्थिति को आप नहीं बदल सकते उसके बारे में सोंच कर दुखी मत
हों.याद रखिये कि समय एक श्रेष्ठ दवा है.
10. यह सृष्टी एक विशाल नाटक है जिसमे हम सभी अभिनेता हैं.हर एक अभिनेता
अपना श्रेष्ठ अभिनय अदा कर रहा है .इसलिए किसी के भी अभिनय को देख कर
चिंतित न हों.
11. बदला न लो लेकिन पहले स्वयं को बदलने का प्रयत्न करो.बदला लेने कि
इच्छा से तो मानसिक तनाव ही बढ़ता है.स्वयं को बदलने का प्रयत्न करने से
जीवन में प्रगति होती है
12. ईर्ष्या न करो परन्तु ईश्वर का चिंतन करो.ईर्ष्या करने से तो मन जलता
है परन्तु ईश्वर का चिंतन करने से मन असीम शीतलता का अनुभव करता है
14. जब आप समस्याओं का सामना करतें है तो ऐसा सोंचिये कि आपके भूतकाल के
कर्मों का हिसाब चुक्तु (चुकता ) हो रहा है.
15. आपके अन्दर रहा थोडा भी अहंकार मन कि स्थिति में असंतुलन का निर्माण
करता है.इसलिए उस थोड़े भी अहंकार का भी त्याग करिये .ययद रखिये कि आप
खली हाँथ आयें थे और खली हाँथ ही वापस जायेंगें.
16. दिन में चार पांच बार कुछ मिनट अपने संकल्पों को साक्षी होकर देखने
का अभ्यास ,चिंताओं से मुक्त करने में सहायक बनता है.
17. अप अपनी सभी चिंताएं परमपिता परमात्मा को समर्पित कर दीजिये
आता है वह तनाव एवं चिंताओं को दूर करके स्वाथ्य में वृद्धि करता है।
18. जीवन में आ रही समस्याओं को देखने का दृष्टिकोण बदलें.दृष्टिकोण को
बदलने से आप दुख को सुख में परिवर्तन कर सकेंगें.
उपरोक्त विचार "प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय
विश्वविद्यालय"ब्रह्मकुमार भगवन भाई आबू पर्वत राजस्तान द्वारा

दिव्य गुण के साथ अपने जीवन--- ब्रह्मकुमार भगवान भाई आबू पर्वत




दिव्य गुण के साथ अपने जीवन--- ब्रह्मकुमार भगवान भाई आबू पर्वत
"अगर जीवन के वृक्ष रंगीन फूलों से भरा है, तो इसका निश्चित रूप से दुनिया भर में फैल जाएगा गुण की मीठी खुशबू, और जीवन जो कांटों से भरा स्वाभाविक चुभन और हर कोई चोट पहुंचाना है." वहाँ शांति नहीं है जहां कांटे हैं और जहां फूल रहे हैं, वहाँ कोई कड़वाहट है. एक धार्मिक जीवन दूसरों के द्वारा पसंद किया है और हमें भी. गुण हीरे और मोती, हमारे जीवन के निर्माण में जड़ी की तरह हैं. एक धार्मिक जीवन तराजू पर मापा नहीं जा सकता है. हो दुनिया की और दूसरी तरफ, एक धार्मिक जीवन पर सभी खजाने से भरा पैमाने के एक ओर चलो. जीवन निश्चित रूप से अधिक मूल्यवान होगा.
उनके जीवन में गुण imbibing. अगर कोई गुण तो अभाव है वे उन्हें अपनाने की कोशिश नहीं करते. जागरूकता के साथ एक व्यक्ति को उसकी / दिव्य गुणों के साथ अपने जीवन को भरने की कोशिश करेंगे.
एक गुणी हालांकि गरीबी ज़खमी, व्यक्ति ज्यादा एक धनी व्यक्ति है जो कभी उनके गले में गुण माला पहनने की कोशिश करता है से बेहतर है. गुण आत्म - संतोष और शांति और खुशी का अनुभव कर सकते एक दे देना. इसके विपरीत, एक सूख चेहरे और असंतोष के साथ किसी को कभी अपने जीवन में आनंद ले सकते हैं. जब से तुम मानव जीवन मिला है, यह इस हद तक दिव्य गुणों से सजाना है कि अन्य सांसारिक सजावट की तुलना में सुस्त लग रही हो. कुछ दिव्य गुणों से नीचे विस्तार में वर्णित हैं:
रॉयल्टी: एक इंसान जो सभ्य और आत्म - सम्मान से भरा है के रूप में वर्णित है. हर किसी के आहार व्यवहार और व्यवहार शाही चाहिए. अपमान दूसरों, कम पात्र लोगों की कंपनी में किया जा रहा है, गुस्सा हर समय हो रही है, धैर्य के साथ दूसरों को सुनने नहीं, अधिक या बिना बात करने के लिए सभी बताते हैं कि नीच है बात करने को कहा जा रहा है.
एक शाही व्यक्ति दूसरों के साथ शांति से संबंधित है, कोई बात नहीं कैसे अन्य लोगों के व्यवहार में, हम अपने रॉयल्टी नहीं छोड़ना चाहिए. प्राचीन राजाओं और उनके परिवारों को उनके जीवन के दौरान रॉयल्टी का बहुत परिलक्षित. वर्तमान समय में, अच्छे परिवार पृष्ठभूमि, जो शिक्षित कर रहे हैं उन लोगों से, वे अपने व्यवहार में शाही हो सकता है और दूसरों को एक ही सिखाना चाहिए. एक शाही व्यक्ति कभी कुछ नहीं के लिए पूछता है, वे क्या वे, वे खो जब दूसरों के द्वारा अपमानित कभी उनके गुस्से के साथ संतुष्ट हैं. उनके व्यवहार महानता प्रतिबिंबित करती हैं, वे कभी गलत भाषा का प्रयोग न ही इसे सुनने के लिए होगा. कि रॉयल्टी जानने के द्वारा एक आलीशान प्रवृत्ति है, यह आपके जीवन में आसानी से और स्वाभाविक रूप से आत्मसात.
संतोष: एक संतुष्ट व्यक्ति हमेशा जीवन में अपनी उपलब्धियों से खुश. यह संकेत है कि हम प्रगति के दरवाजे बंद नहीं करता है, के लिए काम कर रखने और प्राप्त एक गुण है, लेकिन संतोष के साथ किया जाना है. हम सभी को अपने आप सामग्री के साथ है पहले. यह केवल हम संतोष दूसरों को दे सकता है तो. दूसरों के साथ खुश हो सकता है बहुत महत्वपूर्ण है. अगर हर व्यक्ति सामग्री शेष है और संतोष देने के लिए करना है, तो उस परिवार एक खुश एक होगा.
याद रखें, आपका निर्भर नहीं करना चाहिए सामग्री आराम में संतोष, कि संतोष की तरह लंबे समय से स्थायी नहीं है. इस तरह के एक व्यक्ति को अपने जीवन भर की सामग्री नहीं हो सकता. हमें याद रखना चाहिए कि व्यक्ति, जो स्वयं के साथ खुश है हमेशा सामग्री रहेगा. सामग्री आराम के लिए प्यास इच्छाओं बढ़ाने के लिए और असंतोष के जंगल में एक व्यक्ति को भ्रमित करेंगे. सब कुछ होने के बावजूद कुछ लोगों को, कभी संतुष्ट या भरे हुए हैं. इस का कारण यह है कि वे दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं. बंद करो दूसरों को देख, ताकि अपने जीवन में सुख प्राप्त करें. जहां संतोष है वहाँ समृद्धि है, और वहाँ असंतोष है जहां, वहां गरीबी है. अपने आप से पूछो, तुम क्या चाहते हो? जीवन या सामग्री आराम में खुशियाँ. यदि प्राप्त सामग्री बातों पर आप अभी भी सामग्री नहीं लग रहा है, तो वे तुम्हें सच्चा सुख नहीं दे सकता

प्रभु का होकर तो देख प्रभु का होकर तो देख

प्रभु का होकर तो देख

प्रभु का होकर तो देख
राग, भय और क्रोध से अपने चित्त को बचाते रहो । राग आपको बांधता है, भय आपकी शक्तियाँ कुंठित कर देता है और क्रोध आपको तपाता है । अपने बच्चे-बच्चियों को अधिक रोक-टोक कर उनको मानसिक दुश्मन मत बनाओ । चौदह साल से ऊपर के बच्चे-बच्चियों से मित्रवत व्यवहार करो, नहीं तो भीतर से वे तुम्हारे शत्रु हो जाऐंगें तो तुम्हारी अच्छी बात भी उनके गले नहीं उतरेंगी । उनमें हजार-हजार कमियां हो सकती हैं लेकिन कोई एक सद्गुण होगा बच्चे में-बच्ची में, आप उसके सद्गुणों को प्रोत्साहित करें और जो आप सद्गुण डालना चाहते उस सद्गुण की थोड़ी महिमा करें । जो दूसरे सुख देंगें; इस भाव से काम करते हैं उसके काम बंधनकारी हो जाते हैं, दुःख देने वाले हो जाते हैं । अपना कर्तव्य निभाने के लिए बेटे को, बेटी को, पत्नि को,पति को अपनी सेवा करके संतुष्ट कर दो । महान परमात्मा से ही जुड़े रहने में तेरी महानता है । परमेश्वर के नाते आप मिलो । परमेश्वर के नाते पति की, पत्नि की, मित्रों की, साधक की, संत की, गृहस्थ की सेवा कर लो बस; तो आपको विश्रांति मिलेगी, विश्रांति आपकी माँग है । परमात्मा में विश्रांति से आपका स्वस्थ जीवन, सुखी जीवन, स्वभाविक हो जाएगा । जो मौत के बाद भी तेरा साथ नहीं छोड़ेगा; उसको छोड़कर मूर्ख तू किसको आश्रय बनाता है मरने वालों को, मिटने वालों को आश्रय बनाता है । अमिट का आश्रय छोड़कर मिटने वालों को कब तक आश्रय बनाएगा भैया ! सुधर । शाश्वत को छोड़कर नश्वर की शरण कब तक जाएगा? ये मेरे काम आएगा, वो मेरे काम आएगा ना........ ना....... ये शरीर के काम आऐंगें तो अहंकार बढ़ेगा; नहीं काम आऐंगें तो अशांति बढ़ेगी । तेरे काम तो तेरा पिया आएगा । राग को हटाते जा लाला । डर क्यूँ लगता है ? शरीर को मैं मानता है, वस्तुओं को सच्ची मानता है, इसलिए तू डरता है,विकारों को पोसता है, इसलिए तू डरता है । कपट रखता है, इसलिए तू डरता है । तू सच्चाई की शरण ले । क्रोध क्यों होता है? वासना की पूर्ति में कोई विघ्न डालता है, मान्यता में कोई विघ्न डालता है तो क्रोध होता है छोटे पर, भय होता है बड़े से, द्वेष होता है बराबरी वालों पे । तू वासना को महत्व ना दे, तू परमात्मा की प्रीति को महत्व दे । आज ये तीन चीजें बहा दो बस ! भय, क्रोध और राग तू जा । प्रीति,नम्रता और प्रभु आस्था तू मेरे दिल में आ । भय, क्रोध और राग तू जा । ना जा तो पड़ा रह, मेरा क्या जाता है, मैं तो प्रभु का, प्रभु मेरा......। भय, राग और क्रोध से लड़ने की भी जरूरत नहीं । मैं आपको क्या बताऊँ मैं एक आसाराम नहीं, हजार आसाराम और एक आसाराम की हजार जीभें हों फिर भी उसने जो दिया है, मैं ब्यान नहीं कर सकता हूँ, आपको सच बोलता हूँ । आप उसका आश्रय लो बस । हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ । जो सभी का आश्रय है आपका भी सचमुच में वही आश्रय है । लेकिन आप कपट का आश्रय लेकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारते हैं । आप काम का आश्रय लेकर अपने को नोचते हैं । आप द्वेष का आश्रय लेकर अपने को सताते हैं । आप लोभ का आश्रय लेकर अपने को डुबाते हैं । आप उसी का आश्रय लीजिए जो ब्रह्मांडों का आश्रय दाता है । इतने समर्थ का आश्रय छोड़कर तुम कहाँ भटकोगे भैया?कब तक भटकोगे भैया? आश्रय भी भगवान का, और प्रीति भी भगवान की, आपका तो काम बन जाएगा, आपकी मीठी निगाहें पड़ेंगी उसका भी मंगल होने लगेगा । ये तुम्हारे शरीर गुड्डे-गुड्डी जैसा है, जरा-सा चमड़े की ऊपर की लीरी हटाओ तो क्या भरा है? जरा-सा सोच लो फिर भी सुंदर लगता है, तो सौंदर्य उसका है ना । बुद्धिमानी लगती है तो उसकी है ना, चतुराई लगती है तो उसकी है ना । आप रोज उसकी शरण में जाइए, उसमें विश्रांति पाइए । आपके दोष दूर होने लगेंगें । उसकी करुणा-कृपा के आगे,आपकी मुसीबत की, निगुड़ी मुसीबत की क्या ताकत है उसकी दया के आगे? वे लोग बहुत धोखे में हैं,जो संसार में सुखी होना चाहते हैं । भगवान श्रीराम के पिता भी संसार में सुखी नहीं हुए,कृष्ण के पिता भी सुखी नहीं हुए तो तुम उससे भी बड़े हो गए क्या, संसार तुमको सुख दे देगा । आप प्रेम बढ़ाते जाइए । भगवान की शरण होते जाइए । परमात्मा के नाते पुत्र की, परिवार की सेवा करो, लेकिन बदले में उनसे सुख की लालच या कृपा ना चाहिए । कृपा तो वही दे रहा है और सत्संग, एकांत । एकांत अपने लिए, सेवा समाज के लिए और प्रीति परमात्मा के लिए । एक तो भगवान को प्रेम करते जाओ; दूसरा जिस किसी से मिलो बदले की भावना में ना, सेवा भाव से करो, फिर देखो क्या होता है, चमत्कार । आप उद्देश्य बनाऐंगें तो उद्देश्य की पूर्ति के लिए रोज अपने को याद कराऐंगें कि मेरा उद्देश्य क्या है? मुझे इसी जन्म में परमेश्वर को पाना है । मुझे इसी जन्म में सुख-दुःख से पार होना है । मुझे, इस जन्म के पहले जो मेरे साथ था, और मरने के बाद भी जो मेरे साथ रहेगा, उस प्यारे को, उस पिया को मिलना है ।तीसरी बात सत्संग ना छोड़ो । चौथी बात एकांत में प्रतिदिन थोड़ा समय बढ़ाते जाओ ।