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Thursday, March 20, 2014

विवेक को नष्ट कर देता है क्रोध ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय में सिखाई जीने की कला

विवेक को नष्ट कर देता है क्रोध
ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय में सिखाई जीने की कला
अमर उजाला ब्यूरो
रादौर। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में मंगलवार को माउंट आबु राजस्थान से आए राजयोगी ब्रह्माकुमार भगवान ने कहा कि क्रोध मनुष्य के विवेक को नष्ट कर देता है। जरा-सा क्रोध या आवेश में मनुष्य अपने आप को कभी न सुधारने वाली भूल कर बैठता है। इस पर नियंत्रण पाने की कला है राजयोग। इसके माध्यम से ही हम स्वयं पर नियंत्रण कर आसुरी वृत्तियों को दैवीवृत्ति में परिवर्तन कर जीवन में पुण्य कमा सकते हैं। उन्होंने कहा कि परमात्मा ही हमारा सच्चा साथी व मददगार है। परमात्मा की याद हमें हर पल शक्ति देती है, इसलिए परमात्मा को कभी भी भूलना नहीं चाहिए। क्रोध के कारण शरीर पर बुरा असर पड़ता है। जिस कारण अनेक शारीरिक व मानसिक बीमारियां पैदा होती हैं। राजयोग द्वारा अष्टशक्तियों और अनेक सद्गुणों को जीवन में विकास होता है।
राजयोग मानसिक बीमारियों को समाप्त करने की एक संजीवनी बूटी है।

Thursday, November 28, 2013

इंद्रियों पर संयम से बढ़ा सकते हैं मनोबल

इंद्रियों पर संयम से बढ़ा सकते हैं मनोबल


इंद्रियों पर संयम से बढ़ा सकते हैं मनोबल
करनाल त्न राजयोगी ब्रह्मकुमार भगवान भाई ने कहा कि राजयोग के द्वारा हम अपनी इंद्रियों पर संयम रखकर अपने मनोबल को बढ़ा सकते हैं। आंतरिक शक्तियों और सद्गुणों को उभार कर जीवन में निखार ला सकते हैं। वे संत नगर स्थित नगर की स्थानीय शाखा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि राजयोग के अभ्यास द्वारा सहनशीलता, नम्रता, एकाग्रता, शांति व धैर्यता, अंतर्मुखता जैसे सद्गुणों का जीवन में विकास कर सकते हैं। राजयोग से मन की शांति भी संभव है। राजयोग के अभ्यास से इंद्रिय सुख की प्राप्ति होती है। जिन्होंने इंद्रिय सुख को प्राप्त कर लिया उन्हें इस संसार को वस्तु वैभव फीका लगने लगता है। राजयोग के अभ्यास से विपरीत परिस्तिथयों में भी सकारात्मक चिंतन द्वारा मन को एकाग्र किया जा सकता है। वर्तमान में तनाव के माहौल में मन को एकाग्र और शांत रखने के लिए राजयोग संजीवन बूटी की तरह काम आता है। स्थानीय राजयोग केंद्र से बीके लक्ष्मी बहन ने कहा कि परमपिता शिव परमात्मा सहज राजयोग और आध्यात्मिक ज्ञान द्वारा सृष्टि को फिर सतयुगी दैवी सृष्टि में परिवर्तन करने का कार्य कर रहे हैं।

श्रद्धालुओं को प्रवचन सुनाते ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के भगवान भाई।

Sunday, November 3, 2013

बायो --डाटा (परिचय ) ब्रह्मा कुमार भगवान भाई








बायो --डाटा (परिचय ) ब्रह्मा कुमार भगवान भाई आबू पर्वत बायो --डाटा
(परिचय ) ब्रह्मा कुमार भगवान भाई आबू पर्वत ब्रह्माकुमारी नाम: राजयोगी
ब्रह्मा कुमार भगवान भाई ब्रह्माकुमारी शांतिवन में राजयोगा टीचर
मुख्यालय प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विद्यालय विश्व आबू पर्वत
राजस्तान में रसोई विभाग में ब्रह्मा भोजन में सेवा लेखक, विभिन्न मगैनेस
और समाचार पत्रों में शैक्षिक योग्यता: 10 वीं और आय .टी .आय . जन्म
तिथि: जून 1, 1965 सेवा स्थान: अबू रोड, शांतिवन ज्ञान में : 1985 सेवा
में समर्पित कब से 1987: सेवा --- जैसे, ग्राम विकाश कई आध्यात्मिक
अभियानों में , रैली, शिव सन्देश रथ यात्रा, मूल्य आधारित मीडिया अभियान,
मूल्य आधारित शिक्षा अभियान, युवा पद यात्रा, आदि भारत के विभिन्न
प्रदेशों में, साथ ही में नेपाल में भी भाषण विभिन्न विषयों पर पर
संबोधित किया है कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय (5000) स्कूल में नीतिक
मूल्य बारे में स्कूलों और जेलों (800) समाज सेवा पुनर्वास शिविर बाढ़
जैसे प्राकृतिक आपदाओं, भूकम्प आदि कोर्स और प्रशिक्षण कार्यक्रम में
विभिन्न क्लास लिया है यह ईश्वरीय विश्वविद्यालय के एक बहुत अच्छे लेखक
हैं. अपने लेख बहुत बार कई पत्रिकाओं में प्रकाशित कर रहे हैं जैसे
(हिंदी) ज्ञानामृत , विश्व नवीनीकरण (अंग्रेज़ी) के रूप में

Thursday, October 31, 2013

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ब\'चों को चरित्रवान बनाना होता है।

-शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ब\'चों को चरित्रवान बनाना होता है। एक शिक्षक अपने शिष्यों को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है और उसके अवगुणों को गुणों में बदल देता है। शिक्षक एक शिल्पकार की तरह होता है, जिस प्रकार एक शिल्पकार मूर्ति को आकार प्रदान करता है, ठीक उसी प्रकार शिक्षक विद्यार्थी के जीवन को सही दिशा देने का प्रयास करता है। चरित्र निर्माण में एक शिक्षक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यह विचार प्रजापित ब्रम्हाकुमार विश्वविद्यालय माउंट आबू के भगवान भाई ने शिक्षक की भूमिका पर डीडीएम पब्लिक स्कूल में शुक्रवार को आयोजित सेमीनार में व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि यदि एक शिक्षक अनुशासनप्रिय है तभी वह अपने छात्रों को अनुशासनप्रिय बना सकता है। अगर शिक्षक सहनशील है तभी वह विद्यार्थी को सहनशीलता का पाठ पढ़ा सकता है। किसी व्यक्ति का बाहरी व्यक्तित्व यदि बहुत अ\'छा न हो तब भी कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन उसका भीतरी व्यक्तित्व सुदृढ होना चाहिए। जैसा कि कहा जाता है कि अगर व्यक्ति के पास से धन गया तो उसका कुछ नहीं गया, लेकिन यदि उसका चरित्र गया तो सबकुछ चला गया। पर आज के समय में चरित्र बल कमजोर पड़ता जा रहा है। धन की लालसा में लोग चरित्र निर्माण पर ध्यान नहीं दे रहे हंै। इन सारी समस्याओं के समाधान के लिए एक शिक्षक का जागरूक होना बहुत आवश्यक है। आज के समय में जो बीमारियां हो रही है उसका बहुत बड़ा कारण मन में घुला हुआ विष है। नैतिक शिक्षा इक्कीसवी सदी में हमारी मूलभूत आवश्यकता बन गई है। नैतिक शिक्षा शिक्षा का आधार होती है। आज के समय में नैतिक शिक्षा का मूल्य कम होता जा रहा है। ब\'चे बाहरी आडंबर के पीछे भाग रहे है। ब\'चे आने वाले समाज का दर्पण होते हैं, यदि वह ही इन मूल्यों से अछूते रहे तो समाज की रीढ़ ही कमजोर हो जाएगी। ब\'चे की नैतिक शिक्षा का प्रारंभ उसके घर से होता है जो उसे अपनी मां से प्राप्त होता है। बीके किशन भाई व बीके शशि दीदी ने शिक्षकों को संबोधित किया। आभार प्रदर्शन श्रीमती
वीबी सिंह ने किया।

Wednesday, October 30, 2013

नैतिक ज्ञान के बिना अधूरी होती है शिक्षा








नैतिक ज्ञान के बिना अधूरी होती है शिक्षा
 
नैतिक ज्ञान के बिना अधूरी होती है शिक्षा 
चरित्र की शिक्षा के लिए संस्कारवान शिक्षा की जरूरत 
माउंट आबू से आए राजयोगी भगवान भाई ने बच्चों को सिखाया नैतिकता का पाठ
भास्कर न्यूज. बिलासपुर
बच्चों के समुचित विकास के लिए किताबी शिक्षा के साथ ही नैतिक शिक्षा भी जरूरी है। इसके बिना सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, माउंट आबू से आए राजयोगी ब्रह्मकुमार भगवान भाई ने अखिल भारतीय शैक्षणिक अभियान के अंतर्गत छत्तीसगढ़ स्कूल में स्टूडेंट्स को संबोधित करते हुए ये बातें कहीं।

उन्होंने कहा कि छात्र-छात्राओं के लिए जितना जरूरी पढ़ाई है, उतना ही जरूरी नैतिक मूल्यों को जीवन में धारण करने की प्रेरणा देना है। नैतिक मूल्यों की कमी व्यक्तिगत, सामाजिक, पारिवारिक, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सर्व समस्याओं का मूल कारण है। अत: शैक्षणिक संस्थाओं में पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों का मूल्यांकन, आचरण, अनुसरण, व्यावहारिक ज्ञान, लेखन एवं अन्य बातों की तरफ प्रेरणा देने की जरूरत है। इस तरह भी बच्चे अपना संपूर्ण विकास कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि जो शिक्षा बच्चों को अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर, बंधनों से मुक्ति की ओर ले जाए वही वास्तविक शिक्षा है। अपराध मुक्त समाज की स्थापना के लिए मानवीय मूल्यों, नैतिक मूल्यों, नैतिक शिक्षा एवं आध्यात्मिक शिक्षा के द्वारा वर्तमान के युवाओं को सशक्त व संस्कारित करना जरूरी है। आज का युवा कल का भावी समाज है। वर्तमान का सशक्त युवा भविष्य के समाज को सशक्त बना सकता है। वर्तमान समय कुसंग, सिनेमा, व्यसन और फैशन से युवा पीढ़ी भटक रही है। बच्चे सही और गलत का अंतर नहीं कर पा रहे हैं। इसकी वजह से कई बार बच्चे गलत राह पर भी चले जाते हैं।

आध्यात्मिक ज्ञान और नैतिक शिक्षा के द्वारा युवा पीढ़ी को नई दिशा मिल सकती है। उन्होंने बताया कि सिनेमा, इन्टरनेट व टीवी के माध्यम से युवा पीढ़ी को बचाने की आवश्यकता है। युवा पीढ़ी को कुछ रचनात्मक कार्य सिखाएं तब उनकी शक्ति सही उपयोग में ला सकेंगे। इस तरह उनकी उर्जा सकारात्मक दिशा मिलेगी। आज की युवा पीढ़ी को सकारात्मक, सृजनात्मक, निर्माणात्मक, क्रियात्मक बनने की आवश्यकता है।

इस मौके पर स्वदर्शन भवन राजयोग केंद्र की संचालक बीके सविता बहन ने कहा कि भौतिक शिक्षा से भौतिकता की प्राप्ति होती है। अगर चरित्र निर्माण करना हो तो संस्कारवान शिक्षा की जरूरत है। इस मौके पर बीके रामनाथ भाई, बीके महेश भाई, बीके नकुल भाई, बीके इंद्रा बहन सहित बड़ी संख्या में स्कूल स्टाफ व छात्र-छात्राएं शामिल थे। 

Sunday, July 7, 2013

नैतिक शिक्षा से सर्वांगीण विकास संभव है।

मुरैना-!-ब\"ाों के सर्वांगीण विकास के लिए भौतिक शिक्षा के साथ नैतिक शिक्षा भी जरूरी है। नैतिक शिक्षा से सर्वांगीण विकास संभव है। यह बात गुरुवार को ब्रह्माकुमारी ईश्वरी विश्वविद्यालय माउंट आबू से आए भगवान भाई ने मुडिय़ा खेड़ा में आयोजित कार्यक्रम में कही। भगवान भाई ने कहा कि छात्र जीवन में नैतिक मूल्य धारण करें यह आज के समय की आवश्यकता है। नैतिक मूल्यों की कमी से व्यक्तिगत, सामाजिक, पारिवारिक, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समस्याएं पैदा हो रही हैं। छात्रों के मूल्यांकन में आचरण, अनुशरण, लेखन, व्यवहारिक ज्ञान एवं अन्य बातों का भी ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा छात्रों को अंधकार से प्रकाश की ओर असत्य से सत्य की ओर ले जाने वाली होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अपराधमुक्त समाज के लिए जरूरी है कि युवाओं में मानवीय, नैतिक शिक्षा का समावेश किया जाए। जब युवा संस्कारित होंगे तो अपराध कम होंगे और समाज अपराध मुक्त होगा। कार्यक्रम में उपस्थित प्रधानाचार्य कप्तान यादव ने कहा कि मूल्य आधारित शिक्षा से ही व्यक्ति महान बन सकता है और सद्गुणों से व्यक्तित्व बनता है। कार्यक््रम में ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की पूनम बहन, राजेन्द्र कुमार शर्मा, कमलेश राठौड़, निर्मल, कृष्णा शर्मा आदि मौजूद थे।

Saturday, July 6, 2013

सकारात्मक विचारों से ही जीवन की हर समस्या का समाधान मिलता है।

सांचौर। वर्तमान युग समस्या का युग है, समस्या से तनाव बना रहता है सकारात्मक सोच तनाव मुक्ति की संजीवनी बूटी है, इसे अपनाकर ही तनाव से मुक्त रह सकते है, सकारात्मक सोच से जीवन में सच्ची और स्थायी सुख शांन्ति की अनुभूति कर सकते है। उक्त उदïगार मांउट आबु राजस्थान के प्रजपिता ब्रम्हा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय से पधारे राजयोगी ब्रह्मकुमार भगवान भाई ने कहे। वे जैन धर्मशाला में पधारकर ईश्वर प्रेमी भाई बहिनों को सकारात्मक चिन्तन से तनाव मुक्ति विषय पर सम्बोधन करते हुए बोल रहे थे।

भाई ने कहा कि सकारात्मक विचारों का महत्व बताते हुए कहा कि सकारात्मक विचारों से ही जीवन की हर समस्या का समाधान मिलता है। उन्होंने बताया कि सकारात्मक विचारों से एकाग्रता से मन की गहराईयों में छुपी हुई आन्तरिक शक्तियों की जांगृति हम कर सकते हैं, उन्होंने बताया कि सकारात्मक विचारों के द्वारा ही अपने मनोबल को मजबूत कर असम्भव कार्य को सम्भव कर जीवन के हर क्षेत्र में सफलता हासिल कर सकते है। कार्यक्रम के दौरान पुष्पा बहन द्वारा स्वागत किया गया ।


ईर्ष्‍या

आज का चिंतन - ईर्ष्‍या

आज का विचार... हम अनजाने मे ही अपना बुरा करते जाते हैं, और दूसरे का बुरा करना चाहते हैं, जिसे सीधे शब्दो मे हम जलन कहते हैं। दूसरो कॊ हर बात से जलाना,  ईर्ष्‍या करना,  इस से अन्य व्यक्ति का कोई नुक्सान तो नही होता बल्कि हम अपना ही नुकसान करते जाते हैं...।तो आयें विचार करे इस बात पर और बचे इस नुकसान से..... तो यह पढे आज का विचार

दो भाईयो की दुकान एक ही बाजार मे थी और थी भी बिलकुल आमने सामने। दोनो भाई बेचते भी एक ही तरह का समान थे। दोनो की दुकाने भी भगवान की दया से चलती भी खूब थी। पैसे की कमी भी दोनो को नही थी।  लेकिन इस के वावजूद दोनो भाईयो की सेहत दिन पर दिन गिरती जाती थी। बहुत दवा दारु किया। झाड पूंछ भी करवाया। पूजा पाठ यानि सब कुछ करवाया लेकिन दोनो भाईयो की सेहत मे कोई भी फ़र्क नही आया।  थक हार कर अब दोनो भाई जादू टोने वालो के पास भी गये लेकिन बात फ़िर भी ना बनी। और दोनो भाई यह सोच कर बैठ गये कि कोई लाइलाज बीमारी लग गई है। .समय बीतता रहा, एक दिन एक रिश्तेदार जब उनसे मिलने आया तो दोनो भाईयो को देख कर हैरान हुआ।  फ़िर दो चार दिन उन के साथ रहा और जाने से पहले बोला मेरे पास एक ईलाज है आप दोनो की बीमारी का।  लेकिन थोड़ा कठिन है। दोनो भाई सुन कर खुश हुऐ और बोले बताओ हम सब कुछ करने को तैयार है। तो उस रिश्तेदार ने कहा ईलाज शुरु करने से पहले आप दोनो को अपना स्थान बदलना पडेगा। दोनो भाई कुछ समझ नही सके तो  रिशतेदार बोला तुम दोनो भाई एक महीने तक अपनी दुकान मे मत जाना, बल्कि एक महीना दूसरे की दुकान ईमानदारी से संभालाना। उस के बाद तुम्हारा ईलाज शुरू करुंगा। दूसरे दिन से ही भाई एक दूसरे की दुकान सम्भालने लगे।

एक महीने के बाद जब वह रिश्तेदार इन से मिलने आया तो दोनो भाई काफ़ी स्वस्थ दिख रहे थे  और काफ़ी खुश भी थे।  तब रिश्तेदार ने कहा कि आप दोनो को कोई भी बीमारी नही है बस तुम दोनो मे ईर्ष्‍या थी। जब तुम अपनी अपनी दुकान पर बैठे दूसरे की दुकान मे ग्राहक को जाते देखते थे तो जलते थे और यह बात मैने दो दिन तुम्हारे साथ रह कर देखी थी ओर उसी ईर्ष्‍या से तुम अपना ही नुकसान करते रहे थे।  अब तुम दूसरे की दुकान पर बैठकर अपनी दुकान मे जाते ग्राहक देख कर खुश होते हो। यही तुम्हारे स्वस्थ होने का राज़ है।

ईर्ष्या khani

ईर्ष्या khani

एक बार एक गुरु ने अपने सभी शिष्यों से अनुरोध किया कि वे कल प्रवचन में
आते समय अपने साथ एक थैली में बड़े-बड़े आलू साथ लेकर आएं। उन आलुओं पर
उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिए, जिनसे वे ईर्ष्या करते हैं। जो शिष्य
जितने व्यक्तियों से ईर्ष्या करता है, वह उतने आलू लेकर आए।


अगले दिन सभी शिष्य आलू लेकर आए। किसी के पास चार आलू थे तो किसी के पास
छह। गुरु ने कहा कि अगले सात दिनों तक ये आलू वे अपने साथ रखें। जहां भी
जाएं, खाते-पीते, सोते-जागते, ये आलू सदैव साथ रहने चाहिए। शिष्यों को
कुछ समझ में नहीं आया, लेकिन वे क्या करते, गुरु का आदेश था। दो-चार
दिनों के बाद ही शिष्य आलुओं की बदबू से परेशान हो गए। जैसे-तैसे
उन्होंने सात दिन बिताए और गुरु के पास पहुंचे। गुरु ने कहा, ‘यह सब
मैंने आपको शिक्षा देने के लिए किया था।


जब मात्र सात दिनों में आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिए कि आप जिन
व्यक्तियों से ईर्ष्या करते हैं, उनका कितना बोझ आपके मन पर रहता होगा।
यह ईर्ष्या आपके मन पर अनावश्यक बोझ डालती है, जिसके कारण आपके मन में भी
बदबू भर जाती है, ठीक इन आलूओं की तरह। इसलिए अपने मन से गलत भावनाओं को
निकाल दो, यदि किसी से प्यार नहीं कर सकते तो कम से कम नफरत तो मत करो।
इससे आपका मन स्वच्छ और हल्का रहेगा।’ यह सुनकर सभी शिष्यों ने आलुओं के
साथ-साथ अपने मन से ईर्ष्या को भी निकाल फेंका।

बोध कथा - जहां अभिमान होता है वहां कभी ज्ञान नहीं होता ज्ञान को पाने के लिए इंसान को अपना अहंकार को छोडना पड़ता है।

बोध कथा - जहां अभिमान होता है वहां कभी ज्ञान नहीं होता ज्ञान को पाने के लिए इंसान को अपना अहंकार को छोडना पड़ता है।
इंसान को कभी अपनी शक्तियों और सम्पत्ति पर अभिमान नहीं करना चाहिए क्यों कि माया व्यक्ति को बुद्धिहीन कर देती है। और बुद्धिहीन लोग जीवन में कभी ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाते।
एक बार एक जानश्रुति नाम का राजा था उसे अपनी सम्पत्ती पर बड़ा घमंड था एक रात कुछ हंस राजा के कमरे की छत पर आकर बात करने लगे एक हंस बोला कि राजा का तेज चारों ओर फैला है उससे बड़ा कोई नहीं तभी दूसरा हंस बोला कि तुम गाड़ी वाले रैक्क को नहीं जानते उनके तेज के सामने राजा का तेज कुछ भी नहीं है। राजा ने सुबह उठते ही रैक्क बाबा को ढूढ़कर लाने के लिए कहा राजा के सेवक बड़ी मुश्किल से रैक्क बाबा का पता लगाकर आए। तब राजा बहुत सा धन लेकर साधू के पास पहुंचा और साधू से कहने लगा कि ये सारा धन में आपके लिए लाया हूं कृपया कर इसे ग्रहण करें और आप जिस देवता की उपासना करते हे उसका उपदेश मुझे दीजिए साधू ने राजा को वापस भेज दिया।
अगले दिन राजा और ज्यादा धन और साथ में अपनी बेटी को लेकर साधू के पास पहुंचा और बोला हे श्रेष्ठ मुनि मैं यह सब आपके लिए लाया हूं आप इसे ग्रहण कर मुझे ब्रह्मज्ञान प्रदान करें तब साधू ने कहा कि हे मूर्ख राजा तू तेरी ये धन सम्पत्ति अपने पास रख ब्रह्मज्ञान कभी खरीदा नहीं जाता। राजा का अभिमान चूर चूर हो गया और उसे पछतावा होने लगा।कथा बताती है कि जहां अभिमान होता है वहां कभी ज्ञान नहीं होता ज्ञान को पाने के लिए इंसान को अपना अहंकार को छोडना पड़ता है।

बोध कथा- ध्या‍न और सेवा

बोध कथा- ध्या‍न और सेवा

एक बार ज्ञानेश्‍वर महाराज सुब‍‍ह-सुबह‍ नदी तट पर टहलने निकले। उनहोनें देखा कि एक लड़का नदी में गोते खा रहा है। नजदीक ही, एक सन्‍यासी ऑखें मूँदे बैठा था। ज्ञानेश्वर महाराज तुरंत नदी में कूदे, डूबते लड़के को बाहर निकाला और फिर सन्‍यासी को पुकारा। संन्‍यासी ने आँखें खोलीं तो ज्ञानेश्वर जी बोले- क्‍या आपका ध्‍यान लगता है? संन्‍यासी ने उत्तर दिया- ध्‍यान तो नही लगता, मन इधर-उधर भागता है। ज्ञानेश्वर जी ने फिर पूछा लड़का डूब रहा था, क्‍या आपको दिखाई नही दिया? उत्‍तर मिला- देखा तो था लेकिन मैं ध्‍यान कर रहा था। ज्ञानेश्वर समझाया- आप ध्‍यान में कैसे सफल हो सकते है? प्रभु ने आपको किसी का सेवा करने का मौका दिया था, और यही आपका कर्तव्‍य भी था। यदि आप पालन करते तो ध्‍यान में भी मन लगता। प्रभु की सृष्टि, प्रभु का बगीचा बिगड़ रहा है1 बगीचे का आनन्‍द लेना है, तो बगीचे का सँवरना सीखे।

यदि आपका पड़ोसी भूखा सो रहा है और आप पूजा पाठ करने में मस्‍त है, तो यह मत सोचिये कि आपके द्वारा शुभ कार्य हो रहा है क्‍योकि भूखा व्‍यक्ति उसी की छवि है, जिसे पूजा-पाठ करके आप प्रसन्‍न करना या रिझाना चाहते है। ईश्‍वर द्वारा सृजित किसी भी जीव व संरचना की उपेक्षा करके प्रभु भजन करने से प्रभु कभी प्रसन्‍न नही होगें।                                      

सहनशीलता का पाठ


पुराने  समय में अबु उस्मान नाम के आला दर्जे के संत हुए हैं। वे शांत स्वभाव के तथा मितभाषी थे। स्नेहमय आचरण उनके स्वभाव की विशेषता थी। उनसे कोई कितनी ही कड़वी बात कह दे, किंतु वे उसका प्रत्युत्तर बड़े स्नेह से ही देते थे। क्रोध से वे कोसो दूर रहते थे और कहा जा सकता है कि वे विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे। उनके चरित्र की इस ऊंचाई के कारण उनके बहुत सारे अनुयायी थे, जो उनके प्रति श्रद्धा-भाव रखते थे। 
 
एक दिन की बात है, अबु उस्मान अपने कुछ अनुयायियों के साथ कहीं जा रहे थे। जब वे एक मकान के नीचे से गुजरे, तो ऊपर से किसी ने उन पर राख फेंक दी। जो सीधे उनके सिर पर आकर गिरी। यह दृश्य देखकर संत के अनुयायी क्रोध से आगबबूला हो गए। अपने गुरु का अपमान उन्हें बर्दाश्त नहीं हुआ और वे राख फेंकने वाले से बदला लेने पर उतारू हो गए।
 
तब संत अबु ने उन्हें रोकते हुए कहा- ‘तुम लोग गुस्सा क्यों कर रहे हो? जबकि जिस व्यक्ति ने ऐसा आचरण किया है, उसका तो तुम्हें उपकार मानना चाहिए। इसे इस तरह से सोचकर देखो कि जो सिर आग में जलाने लायक था, उस पर उसने मात्र राख ही फेंकी।’ अपने गुरु की सहज-सरल मुस्कान के साथ कही गई यह बात शिष्यों पर जादू सा असर कर गई। उनके इस बड़प्पन को देखकर वे सभी शांत हो गए और गुरु की बात उन्होंने गांठ बांध ली। इस सांकेतिक कथा का निहितार्थ यह है कि धर्य

सहनशीलता और क्षमा में अंतर है

क्षमा के बारे में दुनिया में जो ज़्यादातर विचार हैं वे क्षमा को वीरोचित गुण बतलाते हैं। संस्कृत साहित्य से यदि सहनशीलता के अर्थ को लें, तब भी यह समझ में आता है कि क्षमा के मूल में सहनशीलता ही कहीं है। यह इस प्रकार कि क्षमादान देने वाले सहन करने की क्षमता रखें एवँ जिसे क्षमा किया जा रहा है उसके प्रति शत्रुभाव या दंड देने की लालसा न रखे। सहनशीलता यदि गुण है तो वह वीर का ही गुण हो सकती है। यहाँ वीर से आशय शारीरिक या भौतिक नहीं बल्कि चारित्रिक स्तर की वीरता है। कायर को यदि पीड़ा सहन करनी पड़े तो यह उसकी विवशता कही जाएगी। महाभारत में गुरू परशुराम की सेवा के समय कर्ण जैसे वीर के द्वारा पीड़ा सहन करने की कथा आती है। कर्ण की इस सहनशीलता से ही गुरू समझ गये थे कि ब्राह्मण वेश में यह युवक एक क्षत्रिय (योद्धा, अतः वीर) है।
किंतु सहन करने के लिये क्षमा कर देना आवश्यक नहीं। यदि मैं आपको चोट पहुँचाऊं तो अपनी सहनशीलता का परिचय आप पीड़ा को सहनकर भी दे सकते हैं। एक, मुझसे बिना किसी भी संवाद के भी आपका पीड़ा को सहन करना संभव है। दो, मान लीजिये कि मेरे द्वारा शारीरिक चोट पहुँचाने पर आप मुझे शाब्दिक हिंसा (गाली इत्यादि) से दुःख पहुँचाते हैं, तब भी शारीरिक पीड़ा तो आपको सहन करनी ही पड़ेगी, साथ ही लोकाचार के अनुसार यह स्थापित हो जाएगा कि आपने मुझे क्षमा नहीं किया। तीन, यदि आपने मुझे क्षमा कर भी दिया, तब भी पीड़ा तो आपको सहन करनी ही पड़ेगी।
क्या सहनशील व्यक्ति ही क्षमा का अधिकारी है?
सहनशीलता और क्षमा में अंतर है। यह भी आवश्यक नहीं कि जिसे क्षमादान देना हो उसे सहनशील होना ही चाहिये। क्षमा कमजोर का भी अस्त्र हो सकता है।
उदाहरण के लिये किसी बलशाली व्यक्ति ने किसी दुर्बल पर प्रहार किया। बलशाली व्यक्ति का उद्देश्य दुर्बल को बार-बार दुःख पहुँचाना था, अतः वह चाहता था कि दुर्बल उस पर प्रतिप्रहार करे। ऐसे उदाहरण में बलवान को अवश्य ही यह बोध होगा कि उसका दुर्बल पर अत्याचार अनैतिक है। दुर्बलों में सहन करने की क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है। किंतु दुर्बल ने कह दिया कि जाओ बलवान मैं तुम्हें क्षमा करता हूँ। ऐसा करने पर संभव है बलवान को पहले तो लड़ाई के जारी न रहने का खेद हो लेकिन साथ ही इसकी प्रबल संभावना है कि बलवान को अपने किये पर पश्चाताप हो। कम से कम इतना तो अवश्य होगा कि दुर्बल पर प्रहार करने की जो तीव्र भावना बलवान के मन में थी वह क्षीण हो जाएगी। इस प्रकार क्षमा दुर्बलों का अस्त्र प्रमाणित होता है। लेकिन आश्चर्य है कि हम देखते हैं कि अधिकांश उद्धरणों में क्षमा को वीरों का अस्त्र बताया गया है।

B K Bhagwan Bhai Lectures brahmakumari, : भगवानभाई, B K Bhagwan Bhai Lectures

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B K Bhagwan Bhai Lectures

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   01. Samasya Samadhan -03-12-12
  02. Sampurnata Ka Purusharth - 21-01-13  
  03. Sada Khush Ka Purusharth - 23-02-13 
  04. Vyarth Sankalp Mukt - 12-03-13   
  05. Khushi - 24-03-13   
  06. Vyarth Se Mukt - 31-03-13 
  07. Kamazori Samapt Nirvighna Sthiti - 7-04-13  
      
017035-1Pravchanmala   
  01. Nirankari Nirvikari
 
  02. Swarajya Adhikari
 
  03. Bap Saman bane ke liye Maipan ka tyag
 
  04. Purushrath me Atamabhimani ka Mahtav
 
  05. Kamjor Sanskaro ko keise samapta kare
 
  06. Season murli yo ka sar
 
      
027035-2Pravchanmala   
  01. Introduction
 
  02. Yog ki Gaharai
 
  03. Yog ka Adhar
 
  04. Ashariri Farishta Sisthi
 
  05. Samsaya ka Samadhan
 
         
037035-3Pravchanmala      
  01. Achchhe Bachche kaise bane
 
  02. Samay ka sadupyog
 
       
04 7035-4Pravchanmala   
  01. Krodh ka Laxan or Nivaran
 
  02. Sankalpo ka Khajana
 
  03. Purushrath me Swarajya ka Mahatav
 
  04. Dehi Abhimani sthithi
 
  05. Parchintan pardarshna parmat se mukta kese rahe
 
  06. Karmo ki gudh gati
 
       
05 7035-5Pravchanmala   
  01. Shaktishali Sthithi Ka Purusharth 
  02. Sankalp Shakti Ka Mahatav 
  03. Vyarth Sankalpo Ka karan or Nivaran 
  04. Sada Santhushtha Kaise rahe